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चार साल दिल्ली सल्तनत की राजधानी रहा बदायूं 

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आपने मुग़ल-ए-आज़म फिल्म का प्रसिद्ध गीत ‘प्यार किया तो डरना क्या’ जरूर सुना होगा इसके गीतकार थे शकील बदायूंनी, आज हम उन्हीं के शहर बदायूँ की बात करेंगे। सूफी संत और औलिया की सरजमीं कहलाने वाला बदायूँ अपनी अनोखी पहचान के लिए दुनिया भर में मशहूर है। एक समय तक बदायूँ को रूहेलखण्ड का दिल कहा जाता था। सुल्तान इल्तुतमिश के शासन दौरान 1210 ईस्वी से 1214 ईस्वी तक चार साल के लिए दिल्ली सल्तनत की राजधानी बदायूं थी।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख कारोबारी जिले की हैसियत रखने वाला बदायूँ 4234 sq km में फैला हुआ है जिसकी आबादी तकरीबन 37 लाख है जिसमें से 21 फीसद आबादी मुस्लिम है। अभी तक हम लोग यही सुनते आये हैं कि फलां साहब ने अपनी बेगम की याद में मकबरा बनवाया मगर बदायूँ में आ कर यह कहानी उल्टी पड़ गयी। बदायूँ की सबसे प्रसिद्ध जगह ‘रोजा इख़लास ख़ान’ का निर्माण नवाब इखलास खान की पत्नी ने अपने पति (इखलास खान) की याद में करवाया था।

बदायूँ जिले में 6 विधानसभा और 1 लोकसभा की सीट है जिन पर समाजवादी पार्टी की पकड़ मानी जाती थी मगर पिछले चुनाव में यह मिथक भी टूट गया। बदायूँ का शुमार देश के उन पिछड़े जिलों में होता है जिन्हें भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय (2006) की तरफ से विकास के लिए खास तौर पर ऐड मिलती है। दिल्ली से केवल 280 किलोमीटर दूर होने की वजह से बदायूँ ट्रांसपोर्ट के मामले में काफी बेहतर है।

भारत के सबसे पुरानी और बड़ी मस्जिदों में शामिल बदायूँ की जामा मस्जिद जिसको सुल्तान इल्तुतमिश ने बनवाया था इस शहर का सबसे बड़ा आकर्षण है। शिक्षा और स्कूलों के मामले में बदायूँ उत्तर प्रदेश के बाकी जिलों से अच्छी पहचान रखता है। बदायूं अपने जरी-जरदोजी उत्पादों के लिए प्रसिद्ध है। यह काम तहसील बदायूं, बिसोली और दातागंज में प्रमुख है। लगभग 35 फीसदी परिवार इस उद्योग में लगे हुए हैं।

बदायूँ का सेहत सेवाओं के मामले में यह आलम है के यहाँ बच्चों का इन्फ़ैकशन से मरना बहुत आम बात है। आप अगर बदायूँ की परेशानियों की लिस्ट बनाना शुरू करेंगे तो आप खत्म हो जाएंगी मगर लिस्ट मुकम्मल न होगी। बाकी नेता लोग अपनी रस्साकशी में कुछ भी दावा करें उस पर यकीन करना खुद को धोखा देने जैसा है….

बाकी सब खैरियत है

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