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Opinion | मदरसे, मीडिया और प्रोपेगेंडा की साज़िश.

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एक लॉबी है जिसको मदरसों से हमेशा तकलीफ रही है. इसकी वजह है, मदरसों की वजह से मुस्लिम कम्युनिटी का उर्दू, अरबी, फ़ारसी, मज़हब और इस्लामी तालीम से लिंक बाक़ी है और मज़बूत है. मीडिया, टीवी, रेडियो, अखबारों में तो सिर्फ एक ही तहज़ीब और धर्म के लिए जगह है.

स्कूलों में भी प्रैक्टिकल लेवल पर तीसरी ज़बान तक चुनने की आज़ादी कम जगहों पर है और ज़बरदस्ती ऐसी भाषा पढ़ा दी जाती है जो बोली भी नहीं जाती, मगर उसका मक़सद सिर्फ ये है कि दुनिया की एक बड़ी और बोली जाने वाली अहम ज़बान का रिश्ता नयी नस्ल से टूट जाए.

आज से चौबीस पच्चीस साल पहले, ये शुरू हुआ था. मदरसों को कहा गया कि रिकॉग्निशन हासिल करो, सरकार अब मदरसा बोर्ड बना रही है, फैंसी अलफ़ाज़ का इस्तेमाल किया गया, ये कहा गया कि हम मदद करेंगे, आप को इंफ्रास्ट्रक्चर की हेल्प मिलेंगे, मॉडर्नाइजेशन होगा, आप को फंड या ग्रांट मिलेगी तो आप बेहतर तनख्वाह दे पायेंगे.

उस वक़्त भी कुछ ऐसे दारुल उलूम और मदारिस के मोहतमिम थे जो इंटेशन समझ रहे थे. बहरहाल ज्वाइन करने के कुछ साल बाद ही सपोर्ट के नाम पर दखल अंदाज़ी शुरू हो गयी, ये करो, ये मत करो, ये बदलो, इसे इख़्तियार करो, फलां फंक्शन करो, इस दिन ऐसा प्रोग्राम करो, इस थीम पर इवेंट करो और उसकी रिपोर्ट बनाओ, पोर्टल पर अपलोड करो, ऐसा जलसा करो और उस का वीडियो बना कर भेजो.

गोया कंट्रोल बढ़ते बढ़ते ऐसा हो गया कि नौकर या गुलाम के लेवल पर ले आये. हर बात पर कंट्रोल और आपका फ्रीडम छीन लिया. दरअसल कई नेता और अफसर जो एक लॉबी से मुतास्सिर हैं, उन का यही काम है कि मदरसों को टारगेट कर और इसके ज़रिये मुस्लिम कम्यूनिटी को बैकवर्ड प्रोजेक्ट करेने, डिफेम करने के प्रॉजेक्ट पर ही काम करना है.

हर इंस्टीट्यूशन में कमियां होती हैं, मगर आपको मदरसों के वजूद से तकलीफ है. कमियां हैं तो दोस्त की तरह आइये मगर जब ज़हन में सिर्फ शक और नफरत ही घुसी हो तो फिर इंटेंशन कैसे सही होगी? साल भर मदरसों को डेमोनाइज़ करने वाली खबरें प्लांट करना और मीडिया के ज़रिये मदरसों को बैवकर्ड दिखाना, जबकि बेहद कम फीस पर बच्चे पढ़ते हैं और सिर्फ मुस्लिम नहीं, दुसरे धर्मों के बच्चे भी पढ़ते हैं.

जब जूनून तारी हो जाये तो कई लोग सिर्फ इसी खब्त में मुब्तिला हो कर ज़िंदगियाँ गुज़ारते हैं. चाहे इससे समाज और देश को फायदे के बजाये नुकसान हो जाए.

इमेजिन कीजिये कि डेमोनाइज़ करना और प्रोपेगेंडा कैसी ताक़तवर चीज़ होती है कि एक स्कूल बना और किसी ने फ़र्ज़ी दावा कर दिया और अफवाह फैला दी कि ये मदरसा है, तो इसी बुनियाद पर एक अफसर ने जा कर स्कूल को डेमोलिश कर दिया, क्यूंकि मदरसों का वजूद खटकता है और वह डेमोनाइज़्ड हैं तो अफसर को ये ताक़त महसूस हुई की कोई इस बात को अपोज़ नहीं करेगा. ये इस्लामॉफ़ोबिया जिन लोगों की रगों में दौड़ रहा है वह बिलकुल अंधे हो चुके हैं.

बहरहाल, मीडिया को प्रोपगैंडिस्टस के कंट्रोल में जाने से रोकिये, फेक न्यूज़ पेडलर्स और प्रोपैगैंडा फैलाने वालों के झूट को टैकल कीजिये और इस समाज और देश को बचाइए. जर्नल्ज़म को थर्ड रेट प्रोपगैंडिस्टस के चंगुल से निकालिये और ऐसे लोगों को एक्सपोज़ कीजिये.

Shams Ur Rehman Alavi is an Indian journalist from Madhya Pradesh, India. He works with Hindustan Times and also writes for various publications like Firstpost, The Wire, and Huffington Post. Alavi has specially written about the challenges facing the…

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