कल से यह चर्चा चल रही है या यूँ कहें कि चलवाई जा रही है कि सरकार सेवानिवृत्ति के पश्चात वरिष्ठ पदों पर आसीन रहे अधिकारियों के लिए 20 वर्षों का तथाकथित “कूलिंग-ऑफ पीरियड” लागू करने पर विचार कर रही है, जिसके पूर्व वे अपनी सेवा से संबंधित अनुभवों या संस्मरणों को प्रकाशित नहीं कर सकेंगे।
यदि यह समाचार सही है, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि हमारे लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा प्रश्न भी है। लोकतंत्र में शासन की पारदर्शिता, जवाबदेही और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ये तीनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। सेवानिवृत्त अधिकारी भी अंततः इस देश के नागरिक हैं और उन्हें अपने अनुभव साझा करने का संवैधानिक अधिकार है, बशर्ते राष्ट्रीय सुरक्षा या विधिसम्मत गोपनीयता का उल्लंघन न हो।
लेकिन प्रश्न है कि क्या मौजूदा गोपनीयता से जुड़े प्रावधान, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं हैं? यदि कोई संवेदनशील सूचना है, तो उसके लिए पहले से ही तंत्र मौजूद है। फिर ऐसा व्यापक और असाधारण प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है? क्या नरवाने साहब की ‘अप्रकाशित किताब’ ने कोई डर पैदा कर दिया है? आशय ये है कि इस प्रकार कूलिंग-ऑफ पीरियड का विचार न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करेगा बल्कि शासन की कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक विमर्श को भी बाधित करेगा।
पूर्व अधिकारियों द्वारा लिखे गए संस्मरण और विश्लेषण अक्सर नीति-निर्माण की जटिलताओं, प्रशासनिक चुनौतियों और ऐतिहासिक निर्णयों के पीछे की वास्तविकताओं को सामने लाते हैं। इससे आने वाली पीढ़ियों को सीख मिलती है और लोकतंत्र अधिक परिपक्व बनता है। बीस वर्षों की लंबी अवधि इस ज्ञान को अप्रासंगिक बना देगी और पारदर्शिता की भावना को कमजोर करेगी।
यदि ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन है तो उसे तत्काल स्पष्ट करे, संसद को विश्वास में ले, और यह सुनिश्चित करे कि राष्ट्रीय हित की रक्षा के नाम पर लोकतांत्रिक अधिकारों का अनावश्यक क्षरण न हो। लोकतंत्र में सरकार की शक्ति नागरिकों की स्वतंत्रता से ही वैधता प्राप्त करती है, उसे सीमित करके नहीं। जय हिन्द
(लेखक संसद सदस्य हैं और यह लेख उनके एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल से लिया गया है। आप उन्हें उनके आधिकारिक एक्स हैंडल @manojkjhadu पर फॉलो कर सकते हैं।)















