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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ‘झूठी’ धर्मांतरण FIRs पर जताई चिंता, यूपी सरकार से मांगा जवाब।

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत दर्ज हो रही कथित झूठी और निराधार एफआईआर को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। 13 अप्रैल 2026 को की गई कड़ी टिप्पणी में अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 के तहत बड़ी संख्या में ऐसे मामले दर्ज किए जा रहे हैं, जो जांच के दौरान मनगढ़ंत या बेबुनियाद साबित होकर खत्म हो जाते हैं।

यह टिप्पणी जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने मोहम्मद फैजान व अन्य की ओर से दायर एक आपराधिक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान की। याचिका में बहराइच जिले में दर्ज एक एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी।

मामले में आरोप था कि याचिकाकर्ताओं ने शिकायतकर्ता की 18 वर्षीय बेटी को बहला-फुसलाकर ले जाकर उसका जबरन धर्म परिवर्तन कराने और शादी करने की कोशिश की। हालांकि, मामले में तब अहम मोड़ आया जब महिला का बयान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 183 के तहत कोर्ट में पेश किया गया। अपने बयान में महिला ने स्पष्ट कहा कि वह पिछले तीन वर्षों से याचिकाकर्ता के साथ सहमति से संबंध में थी और उसने जबरन धर्म परिवर्तन, शादी या किसी भी प्रकार के दुराचार के आरोपों से इनकार कर दिया।

महिला ने अदालत के सामने याचिकाकर्ता के साथ रहने की इच्छा भी जताई और अपनी तथा अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की। उसने आशंका जताई कि कुछ संगठनों के लोग उसे और उसके साथी को परेशान कर सकते हैं।

कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि महिला के बयान से एफआईआर की बुनियाद कमजोर पड़ने के बावजूद जांच अधिकारी ने केवल बलात्कार का आरोप हटाया, जबकि अन्य धाराओं में जांच जारी रखी। इसे “अजीब स्थिति” बताते हुए बेंच ने कहा कि जब पीड़िता के बयान से ही आरोप खारिज हो रहे हैं, तो जांच जारी रखना अनुचित प्रतीत होता है।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया जांच अधिकारी किसी बाहरी दबाव में काम करता हुआ दिखता है, हालांकि इस पर विस्तृत टिप्पणी करने से परहेज किया गया।

कोर्ट ने इस प्रवृत्ति पर भी चिंता जताई कि ऐसे मामलों में बड़ी संख्या में एफआईआर कथित पीड़ितों की बजाय तीसरे पक्ष द्वारा दर्ज कराई जा रही हैं। इस संदर्भ में अदालत ने राजेंद्र बिहारी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में भारत का सर्वोच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई समान चिंता का भी उल्लेख किया।

सख्त रुख अपनाते हुए हाई कोर्ट ने शिकायतकर्ता, जो महिला का पिता है, को अगली सुनवाई में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया है और पूछा है कि उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए, क्योंकि एफआईआर प्रथम दृष्टया “झूठी, मनगढ़ंत और बेबुनियाद” प्रतीत होती है।

इसके साथ ही अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है, जिसमें ऐसे मामलों पर रोक लगाने के लिए उठाए जा रहे कदमों का विवरण देना होगा। यह हलफनामा 19 मई तक दाखिल करना अनिवार्य है, अन्यथा संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होना होगा।

अगली सुनवाई तक कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। साथ ही राज्य के अधिकारियों को तीन दिनों के भीतर याचिकाकर्ताओं, संबंधित महिला और उसके परिवार को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।

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