इन दिनों भारतीय राजनीति ऐसे दौर से गुजर रही है कि सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी बंगाल जीतकर और वहाँ टीएमसी के जीते हुए जनप्रतिनिधियों में संभावित बड़ी टूट से प्रसन्न दिखाई देती है, लेकिन इस खुशी के बावजूद भाजपा नेतृत्व अपने भविष्य को लेकर गहरी चिंता में भी है। कारण यह है कि देश में अब मूलभूत मुद्दों पर जनचर्चा शुरू हो चुकी है, चाहे वह लगातार पेपर लीक का मामला हो, बेरोज़गारी और शिक्षा के महँगे होने का प्रश्न हो या फिर महँगाई के चरम और देश की आर्थिक स्थिति के कमज़ोर होने का विषय।
इन परिस्थितियों में बार-बार प्रयास हो रहे हैं कि बहस को भाजपा की पारंपरिक पिच पर धकेला जाए, अर्थात मुसलमान–मुसलमान–मुसलमान की बहस की ओर, लेकिन पिछले कुछ दिनों से इस प्रकार के मुद्दों और शोर को कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है। ऐसे में सत्तारूढ़ भाजपा को यह महसूस हो रहा है कि भविष्य में नियंत्रण उसके हाथों से निकल सकता है और इसके बावजूद कि देश का पूरा तंत्र उसके प्रभाव में है, सत्ता को बनाए रखना अत्यंत कठिन हो जाएगा। इन परिस्थितियों में एक रास्ता यह भी दिखाई दिया कि परिसीमन के माध्यम से लोकसभा क्षेत्रों का पूरा जनसांख्यिकीय स्वरूप बदल दिया जाए, लेकिन यह भी असंभव प्रतीत होता है क्योंकि एक बार यह विधेयक संसद में गिर चुका है और दोबारा लाने की तैयारी में भी आवश्यक एक-तिहाई संख्या से भाजपा और एनडीए दूर हैं।
बंगाल के लगभग 19 टीएमसी सांसदों के आने और शिवसेना (उद्धव) समूह के सांसदों के टूटकर आने के बाद भी सरकार आवश्यक संख्या से दूर ही रहेगी। इन हालात में एक उत्साह कांग्रेस और कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी के भीतर दिखाई देता है। पिछले दिनों कांग्रेस ने दक्षिण भारत को अपना मज़बूत गढ़ बनाने पर काम किया है, जिसमें कर्नाटक में किए गए बदलाव और आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी को साथ लाने के प्रयास भी शामिल हैं। इसके साथ ही राहुल गांधी उन राज्यों पर भी ध्यान देते दिखाई दे रहे हैं जहाँ उनका सीधा मुकाबला भाजपा से है, जैसे राजस्थान में तेज़ी से बदलाव और सचिन पायलट को नेतृत्व सौंपने की तैयारी। कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन को भी फिर से सक्रिय करने की कोशिश शुरू कर दी है, जिसकी एक बैठक 8 जून को हुई और आगे प्रत्येक दूसरे महीने गठबंधन की बैठक करने का निर्णय लिया गया है।
इंडिया गठबंधन की बैठक में एक महत्वपूर्ण बात यह रही कि टीएमसी की हार और उसमें संभावित टूट के बाद अब इंडिया गठबंधन की पार्टियाँ कांग्रेस को और एक-दूसरे को चुनौती देने के बजाय कदम से कदम मिलाकर चलने को तैयार दिखाई दे रही हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह हुई कि राहुल गांधी ने अपने सहयोगियों, अन्य विपक्षी दलों, अपनी पार्टी के नेताओं और सांसदों को स्पष्ट संदेश दिया है कि वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध अब प्रतिरोध ही एकमात्र रास्ता है। राहुल गांधी का यह बयान देश की वास्तविक स्थिति को स्वीकार करना है, क्योंकि आज भारत की मौजूदा व्यवस्था में मौजूद शक्तियाँ अब तक की कांग्रेस, समाजवादी या यहाँ तक कि भाजपा सरकारों जैसी नहीं हैं, बल्कि आज देश का पूरा तंत्र कुछ लोगों और एक विशेष वैचारिक समूह के हाथों में केंद्रीकृत होता दिखाई देता है।
आज कार्यपालिका, न्यायपालिका और देश की सुरक्षा एजेंसियाँ तक एक विशेष शक्ति की प्रतिनिधि दिखाई देती हैं और शिक्षा व्यवस्था, मीडिया तथा फ़िल्म उद्योग तक सत्तारूढ़ दल और उसके वैचारिक संगठनों के टूलकिट की तरह काम करते दिखाई देते हैं। देश में चुनावी व्यवस्था पर अब केवल संदेह नहीं रह गया है बल्कि खुलकर यह दिखाई देने लगा है कि चुनाव आयोग अब सिर्फ़ सत्तारूढ़ दल को जिताने के लिए काम कर रहा है और सभी सीमाओं व नियमों को तोड़कर इस कार्य में लगा हुआ है।
ऐसे समय में राहुल गांधी द्वारा इस वास्तविकता को स्वीकार करना और प्रतिरोध का आह्वान करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रतिरोध और बलिदान ही अब इस देश में संविधान की सर्वोच्चता को बनाए रख सकते हैं और यही विपक्षी दलों तथा उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं के राजनीतिक भविष्य को भी बचा सकता है। लेकिन प्रतिरोध केवल “संविधान बचाओ” के नाम पर सम्मेलन करने का नाम नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए शहरों की सड़कों से लेकर गाँवों की गलियों तक आंदोलन खड़ा करना होगा। इसके लिए सबसे पहली आवश्यकता है एक मज़बूत टीम की, जिसके लिए पहले दो बड़े कदम उठाने होंगे।
पहला कदम वह है जिसकी अपील शिवसेना (उद्धव) के नेता संजय राउत ने की है कि वे पार्टियाँ जो कांग्रेस से निकली थीं, वे वापस कांग्रेस में लौट आएँ जैसे बंगाल की टीएमसी, महाराष्ट्र की एनसीपी और आंध्र प्रदेश की वाईएसआरसीपी। यह विलय बड़े पैमाने पर करना होगा और कांग्रेस को एक टीम बनाकर इस दिशा में काम करना चाहिए कि कांग्रेस से निकली सभी पार्टियों के नेतृत्व को सम्मानपूर्वक वापस लाकर उनका पुनः विलय कराया जाए। साथ ही ऐसी अनेक पार्टियाँ भी हैं जिनका प्रभाव केवल छोटे-छोटे क्षेत्रों तक सीमित है लेकिन उनकी कोई स्पष्ट वैचारिक नींव नहीं है, उन्हें भी कांग्रेस में लाने का प्रयास किया जाए। जैसे एनसीपी शरद गुट के आने के साथ ही एनसीपी अजित गुट पर भी काम किया जाए। क्योंकि यही रास्ता उन पार्टियों के अस्तित्व, उनके नेताओं और कार्यकर्ताओं के राजनीतिक भविष्य की सुरक्षा का माध्यम बन सकता है और ऐसा करने से कांग्रेस में वह शक्ति आ सकती है जो वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध के लिए आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त देश में मौजूद दर्जन भर से अधिक कम्युनिस्ट पार्टियों को भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) में विलय करना होगा और यदि ऐसा नहीं हुआ तो इस देश से वामपंथी राजनीति का अस्तित्व समाप्त हो सकता है तथा संविधान की रक्षा की लड़ाई भी कमज़ोर पड़ सकती है।
इसलिए सीपीआई (एम) को इस दिशा में काम शुरू कर देना चाहिए कि छोटे-छोटे मतभेदों को आंतरिक बहस तक सीमित रखते हुए साझा विचार और देशहित के आधार पर वह लेफ्ट गठबंधन, जो कई दशकों बाद देशभर के राज्यों की सत्ता से बाहर है, अब बिखरी हुई कम्युनिस्ट शक्ति के बजाय एक मज़बूत कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में विकसित हो। इसी प्रकार राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, इंडियन नेशनल लोकदल, बीजू जनता दल और आरएलपी जैसी समाजवादी सोच रखने वाली पार्टियाँ भी वी.पी. सिंह के दौर जैसा बड़ा कदम उठाते हुए स्वयं को एकजुट करें और देश में राष्ट्रीय स्तर पर एक मज़बूत समाजवादी पार्टी के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ें, जिसमें आंतरिक संघीय ढाँचा मज़बूत हो और सबके हित सुरक्षित रहें।
यह आवश्यक है ताकि देश में समाजवादी आंदोलन और समाजवादी विचारधारा का भविष्य सुरक्षित रह सके, अन्यथा संभव है कि भाजपा राजनीति और एंटी भाजपा राजनीति के बीच समाजवादी विरासत धीरे-धीरे समाप्त हो जाए। साथ ही इनका एकीकरण समाजवादी पृष्ठभूमि रखने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं के राजनीतिक भविष्य तथा देश के भविष्य दोनों के लिए आवश्यक है। इसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि तमिलनाडु में विजय ने जब अपनी वैचारिक दिशा को द्रविड़ राजनीति के रूप में प्रस्तुत किया है तो वहाँ डीएमके और एआईएडीएमके के विरोध में बनी छोटी-छोटी द्रविड़ पार्टियों तथा एससी/एसटी और ईसाई समाज की पार्टियों का विलय अपनी पार्टी टीवीके में कराकर और एआईएडीएमके से निकले समूहों तथा असंतुष्ट नेताओं को साथ लेकर अपनी अगुवाई में एक मज़बूत द्रविड़ राजनीतिक शक्ति खड़ी करें।
देश में बीएसपी का अस्तित्व लगभग समाप्ति की ओर है और उसके विकल्प के रूप में सांसद चंद्रशेखर आज़ाद की पार्टी आज़ाद समाज पार्टी अपनी जनाधार और संगठनात्मक पकड़ को मज़बूत कर रही है, लेकिन वर्तमान समय की वास्तविकता यह है कि देश में दलित राजनीतिक नेतृत्व लगभग समाप्त हो चुका है। इसलिए आवश्यक है कि आज़ाद समाज पार्टी, प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन अघाड़ी, बहुजन मुक्ति पार्टी सहित बामसेफ के विभिन्न राजनीतिक समूह तथा तमिलनाडु की वीसीके आदि साथ बैठें और एक ध्वज के नीचे देश में एक मज़बूत आंबेडकरवादी राजनीतिक दल का निर्माण करें।
आवश्यकता है कि झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी आगे बढ़कर भारतीय आदिवासी पार्टी और भारतीय ट्राइबल पार्टी जैसी देशभर में फैली आदिवासी समाज की छोटी-छोटी पार्टियों के साथ संवाद करे और सभी को सम्मानपूर्वक एक मंच पर लाकर एक मज़बूत आदिवासी राजनीतिक शक्ति खड़ी करे, जिसकी दिशा में हेमंत प्रयास भी कर रहे हैं। मुस्लिम समाज में राजनीतिक जागरूकता आई है लेकिन कोई मज़बूत राजनीतिक दल मौजूद नहीं है। ऐसे में आवश्यक है कि एसडीपीआई, आईएसएफ, एआईयूडीएफ, पीस पार्टी, उलेमा काउंसिल, आईएमसी, एमएमके, आईएनएल, एमबीटी, डब्ल्यूपीआई, एनएल, मुस्लिम मजलिस आदि साथ बैठें और प्रयास करें कि सभी विलय होकर एक मज़बूत राजनीतिक दल का निर्माण करें जिसकी स्पष्ट वैचारिक नींव हो और जिसके पास स्पष्ट दृष्टि, रोडमैप, संगठनात्मक ढाँचा और कैडर व्यवस्था हो।
इन विलय प्रयासों के संदर्भ में संजय राउत जी को यह भी योजना तैयार करनी चाहिए कि किस प्रकार वे न केवल अपनी शिवसेना (उद्धव) को टूटने से बचाए रखें बल्कि शिवसेना (शिंदे) को एनडीए से वापस लाएँ और राज ठाकरे को साथ लेकर उद्धव ठाकरे, शिंदे और राज ठाकरे की एक संयुक्त एवं मज़बूत शिवसेना का निर्माण करें। साथ ही उद्धव ठाकरे की टीम को चाहिए कि वह हिंदुत्व की पुनर्व्याख्या करे, अर्थात आरएसएस और भाजपा के हिंदुत्व के मुकाबले ऐसे हिंदुत्व की रूपरेखा प्रस्तुत करे जिसमें वर्ण व्यवस्था को अस्वीकार किया गया हो, जिसमें महिलाओं को पूर्ण सम्मान प्राप्त हो, जिसमें अन्य धर्मों के अनुयायियों के प्रति घृणा न हो, जिसमें भारत के सेक्युलर, लोकतांत्रिक और समाजवादी संविधान के लिए पर्याप्त स्थान हो तथा जिसमें महात्मा गांधी के विचारों को महत्व प्राप्त हो।
ऐसे हिंदुत्व को सामने लाने के लिए शिवसेना को व्यवस्थित रूप से काम करना चाहिए, धार्मिक नेताओं के साथ बैठकर शोध आधारित साहित्य तैयार करना चाहिए और साथ ही महाराष्ट्र अस्मिता की अवधारणा को पुनर्जीवित करना चाहिए, लेकिन इस बात का ध्यान रखते हुए कि महाराष्ट्र अस्मिता और भारतीयता साथ-साथ चलें। इन्हीं हिंदुत्व और मराठा अस्मिता के विचारों के आधार पर अपने कैडर का पुनर्निर्माण करना चाहिए। यह भारत की पहली आवश्यकता है कि बड़े पैमाने पर ऐसे विलय दिखाई दें जिनसे कमज़ोर दल समाप्त होकर विभिन्न विचारधाराओं की मज़बूत राजनीतिक शक्तियाँ देश में उभरकर सामने आएँ। और यह असंभव नहीं बल्कि संभव है, जिसके उदाहरण भारतीय राजनीति में मौजूद हैं तथा इस पर राजनीतिक दलों के बीच शांत स्तर पर चर्चा भी होती रहती है। विलय के साथ दूसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता वास्तविक एकता की है।
इंडिया गठबंधन बनने के बाद से उसमें वास्तविक एकता दिखाई नहीं दी, इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष केवल लगभग 45 सीटें एनडीए से कम जीत सका और लगभग 30 सीटों के अंतर से सरकार बनाने से चूक गया। यदि जेडीयू और लोकदल ने साथ न छोड़ा होता तो लगभग निश्चित था कि 2024 में देश में सत्ता परिवर्तन हो चुका होता। लेकिन अब जबकि 2029 की लड़ाई सामने है तो वास्तविक एकता पैदा करने की आवश्यकता है, जिसमें एक ओर इंडिया गठबंधन में शामिल सभी दलों के बीच केंद्रीय स्तर पर समन्वित व्यवस्था बनाई जाए और साथ ही एक संघीय ढाँचा भी तैयार किया जाए ताकि यह एकता राज्यों के भीतर और गाँव-गाँव तक कार्यकर्ताओं के बीच भी दिखाई दे।
यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में सभी स्थानीय निकाय और राज्य स्तरीय चुनाव भी इंडिया गठबंधन एक संयुक्त गठबंधन के रूप में लड़े और “फ्रेंडली फाइट” जैसी रणनीतियों को समाप्त किया जाए, सिवाय केरल और तमिलनाडु जैसे कुछ विशेष राज्यों के। इसके साथ लगातार कैडर कार्यशालाएँ, जन कार्यक्रम और प्रतिरोधी आंदोलन संयुक्त रूप से आयोजित किए जाते रहें तथा हर राज्य में लोकसभा क्षेत्रों तक इस प्रक्रिया को पहुँचाया जाए। यह भी सुनिश्चित किया जाए कि इंडिया गठबंधन की सभी पार्टियों के कार्यकर्ता और नेता बिल्कुल उसी प्रकार मिलकर संघर्ष करें और जनजागरण का कार्य करें जैसे एक परिवार के सदस्य किसी विशेष अवसर पर एक साथ काम करते हैं।
एकता के प्रश्न पर दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान परिस्थितियों में इंडिया गठबंधन की पार्टियाँ अपने अहंकार को तोड़ें और नए सभी महत्वपूर्ण साथियों के लिए दरवाज़े खोलते हुए पूरी कोशिश करें कि जल्द से जल्द इस गठबंधन में नवीन पटनायक, सुखबीर सिंह बादल, अभय सिंह चौटाला, चंद्रशेखर आज़ाद, तमिलनाडु के विजय, प्रकाश आंबेडकर, बदरुद्दीन अजमल, नौशाद सिद्दीकी, एम. के. फैज़ी, डॉ. अयूब, आमिर रशादी, विधायक जौहरुल्लाह, प्रोफेसर सलमान, छोटूभाई वसावा, एस. क्यू. आर. इलियास और उनके जैसे अन्य दलित, आदिवासी, मुस्लिम, ईसाई, कम्युनिस्ट, सिख और समाजवादी नेतृत्व वाली पार्टियों को भी इसमें शामिल किया जाए।
ताकि सड़क से लेकर चुनाव तक एक वास्तविक सामूहिक प्रतिरोध खड़ा किया जा सके, अन्यथा आपका अहंकार और असुरक्षा आधारित यह अनावश्यक सावधानी आपको भी डुबो देगी और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी और यह एकता असंभव नहीं है क्योंकि राज्यों के भीतर अलग-अलग समय में इंडिया गठबंधन की वर्तमान पार्टियाँ इन दलों के साथ गठबंधन करती रही हैं। विलय और एकता की इस नीति पर सक्रिय रूप से काम करने के साथ-साथ यह समझना भी आवश्यक है कि कोई भी लड़ाई बिना कैडर और संगठन के नहीं लड़ी जा सकती और आज हमारे देश की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उनका तथा उनकी मातृ संस्था आरएसएस और उससे जुड़ी सहायक संस्थाओं का मज़बूत संगठन और गाँव-गाँव तक फैली उनकी कैडर व्यवस्था है।
लेकिन विपक्ष की अधिकांश पार्टियाँ इस मामले में केवल पीछे नहीं बल्कि बहुत पीछे हैं। इसलिए आवश्यक है कि ये सभी दल पंचायत स्तर तक मज़बूत संगठन निर्माण पर युद्धस्तर पर काम करें, बिल्कुल उसी भावना और समर्पण के साथ जैसे ईरान अमेरिका से और ग़ज़ा के लड़ाके इज़राइल से संघर्ष करते हैं। पार्टी संगठन के साथ-साथ अपने-अपने युवा मोर्चे, छात्र संगठन, महिला प्रकोष्ठ और विधिक प्रकोष्ठ को भी पूरी तरह सक्रिय करें। इंडिया गठबंधन के लिए चौथी सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता विचारधारा पर काम करना है। राजनीति में विचारधारा सबसे बुनियादी और सबसे महत्वपूर्ण शक्ति होती है। विचारधारा के बिना राजनीति संभव ही नहीं है।
आज भारतीय जनता पार्टी इतनी शक्तिशाली इसलिए हुई क्योंकि उसने अपने विचार हिंदुत्व पर काम किया, उसे घर-घर तक पहुँचाया, उसी आधार पर कैडरों का निर्माण किया और उसी आधार पर जनसक्रियता विकसित की तथा नीतियाँ भी उसी आधार पर बनाई। इसलिए हम देखते हैं कि ऐसे जनसमूह तैयार हुए जो दो हजार रुपये में गैस खरीदकर भी भाजपा को वोट देने की बात करते दिखाई देते हैं। यदि विपक्ष की बात की जाए तो हम देखते हैं कि विचारधारा से रिक्त टीएमसी जैसे दलों के सांसद और विधायक रेत की दीवार की तरह ढह गए, लेकिन मज़बूत वैचारिक पृष्ठभूमि रखने वाली पार्टियाँ जैसे आरजेडी और समाजवादी पार्टी चुनावी पराजय के बावजूद कायम हैं और उनके विधायक व सांसद अपने नेतृत्व के साथ खड़े दिखाई देते हैं।
इसके बावजूद कि आज आरजेडी और समाजवादी पार्टी जैसी पार्टियाँ भी अपनी मूल वैचारिक पहचान को धुंधला कर चुकी हैं, फिर भी बुनियादी स्तर पर विचारधारा की पकड़ मज़बूत होने के कारण उनकी संरचना अभी भी कायम है। इसलिए आवश्यक है कि जिन पार्टियों की अपनी कोई स्पष्ट वैचारिक आधारशिला नहीं है, जैसे एनसीपी और टीएमसी आदि, वे अपने मूल राजनीतिक घर में लौट जाएँ जहाँ से वे निकली थीं और जिन दलों की वैचारिक नींव मौजूद है, वे तत्काल राजनीतिक विशेषज्ञों और वैचारिक चिंतकों की टीम तैयार करके अपने प्रत्येक सांसद, विधायक, विधान परिषद सदस्य और राष्ट्रीय समितियों से लेकर पंचायत स्तर तक की इकाइयों के वैचारिक प्रशिक्षण पर काम शुरू करें और यह काम इस स्तर पर होना चाहिए कि एक भी दिन ऐसा न गुज़रे जिस दिन एक दर्जन या डेढ़ दर्जन वैचारिक तथा नेतृत्व निर्माण कार्यशालाएँ आयोजित न हो रही हों।
स्पष्ट वैचारिक दिशा पर काम शुरू करने से इन दलों में मौजूद संघ के स्लीपर सेल असहज होने लगेंगे और कुछ अनुभवहीन कार्यकर्ता भी इन विषयों पर बहस करेंगे, लेकिन वास्तविकता यही है कि आपका अस्तित्व, आपकी पार्टी का अस्तित्व और देश के लोकतांत्रिक भविष्य की सुरक्षा इसी में निहित है। ये चारों कार्य—विलय, एकता, कैडर एवं संगठन निर्माण, वैचारिक स्पष्टता और वैचारिक प्रशिक्षण—इंडिया गठबंधन और उससे जुड़ी पार्टियों के लिए वैसे ही आवश्यक हैं जैसे किसी मनुष्य के लिए जल, भोजन और वायु। समय आ गया है कि कांग्रेस नेतृत्व, इंडिया गठबंधन की सभी पार्टियों का नेतृत्व और विपक्ष की सभी राजनीतिक शक्तियाँ इन सभी बिंदुओं पर जितनी जल्दी संभव हो काम प्रारंभ करें।
अंत में इन सभी बिंदुओं के साथ यह बात भी मन में बैठा लेनी चाहिए कि राहुल गांधी ने इंडिया गठबंधन की बैठक में जो बात कही की “स्वतंत्रता से पहले कांग्रेस ने जिस दृढ़ता के साथ प्रतिरोध का मार्ग अपनाया था, आज भी वही मार्ग अपनाना होगा” वह आज के समय की ऐसी वास्तविकता है जिसे स्वीकार किए बिना कोई विकल्प नहीं है। इसलिए आपको प्रत्येक हेट क्राइम के मामले में अपराधी के विरुद्ध सड़क से लेकर पुलिस स्टेशन और अदालत तक संघर्ष करना होगा। आपको प्रत्येक हानिकारक नीति के विरुद्ध सदन में एकजुट होकर आवाज़ उठानी होगी, मीडिया में एक स्वर बोलना होगा और सड़कों पर प्रतिरोध दर्ज करना होगा।
आपको जनता के बीच लगातार जागरूकता अभियान चलाने होंगे और राष्ट्रीय स्तर पर महँगाई, बेरोज़गारी, पेपर लीक, दलितों, आदिवासियों, ईसाइयों, मुसलमानों और पिछड़े वर्गों के विरुद्ध होने वाले हेट क्राइम, उनके खिलाफ बनाई जा रही नीतियाँ, बलात्कार, अपराध, भ्रष्टाचार, मानवाधिकार उल्लंघन और देश की आर्थिक व्यवस्था के संकट जैसे विषयों पर प्रतिरोध का आंदोलन खड़ा करना होगा। और ऐसा आंदोलन जिसमें लोग जेल जाने और बलिदान देने के लिए तैयार होकर निकलें तथा संघर्ष करते रहें, जब तक कि देश में व्यवस्था परिवर्तन सुनिश्चित न हो जाए।
(डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह लेखक के निजी विचार हैं। इनका Lallanpost से कोई संबंध नहीं है और न ही वे आवश्यक रूप से उसके विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेखक इंसाफ टाइम्स (उर्दू, हिंदी एवं अंग्रेज़ी न्यूज़ वेबसाइट) के मुख्य संपादक हैं।)

















