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देश को आज़ाद कराने के लिए हमारे बुज़ुर्गों ने बलिदान दिया है। : राफ़े इस्लाम (एस.आई.ओ यूपी सेंट्रल अध्यक्ष)

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आज जब हमारा देश अपना 77वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, देश के कोने-कोने में जश्न का माहौल है और हमें यह देखकर खुशी हो रही है कि आज इस देश को आजाद कराने के लिए हमारे बुजुर्गों ने बलिदान दिया है 76 साल बाद हम उनके बलिदान को याद कर रहे हैं। स्वतंत्रता हमारे लिए आनंद और प्रसन्नता का स्थान है। आजादी का दिन जहां हम इन बुजुर्गों के बलिदानों को याद करते हैं और उनका स्मरण करते हैं, वहीं यह हमें उन लक्ष्यों के बारे में भी सोचने का एहसास देता है जिनके लिए हमने अपनी आंखों में आजादी का सपना देखा था। क्या हम वास्तव में उन सपनों को साकार कर पाए या नहीं? क्या वो आज़ादी के लक्ष्य हैं जिसके लिए लाखों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, इस आज़ादी के लिए न जाने कितनी महिलाएँ विधवा हो गईं, कितने बच्चे अनाथ हो गए। ये सपना, ये मंजिल हमें मिली या नहीं? इस पर हम सबको मिलकर विचार करना चाहिए। 

भाई राफ़े इस्लाम (एस.आई.ओ यूपी सेंट्रल अध्यक्ष) ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रेस को एक संदेश में अपने विचार व्यक्त किए। राफ़े इस्लाम ने कहा कि इस देश की 77वीं वर्षगांठ पर देश के सभी नागरिकों को एक साथ बैठकर सोचना चाहिए कि हम 77 साल पहले कहां थे और आज जब हम हर जगह नफरत के बीज बोने के मौके पर खड़े हैं. दो समुदायों और दो संप्रदायों और दो धर्मों के बीच तनाव पैदा करने की कोशिश की जा रही है। तो आज़ादी का सन्देश और जो प्रयास हम अपने सामने देखते हैं, ये दोनों हमें विरोधाभासी लगते हैं! इस पर विचार करने की जरूरत है। 

आज़ादी से पहले, धार्मिक बुजुर्गों ने एक आदर्श देश का सपना देखा था। ऐसे समाज का, ऐसे अद्भुत घर का जहां बड़ा भाई हमेशा छोटे भाई को अपने साथ रखता है, कदम से कदम मिलाकर उसकी जरूरतों का ख्याल रखता है, पल-पल उसके साथ खड़ा होता है और एक बेहतर भारत का निर्माण करता है। आइए नेतृत्व के लिए मंच तैयार करें और हम सब लोग मिलकर देश का नाम रोशन करें।  लेकिन यह कहते हुए दुख हो रहा है कि कुछ विध्वंसक ताकतें जिन्हें देश का विकास मंजूर नहीं है, जिन्हें देश को ऊंचे स्थान पर ले जाना मंजूर नहीं है, वे इस देश को पीछे वापस ढकेलना चाहते हैं। एक सांप्रदायिक दंगा,एक सांप्रदायिक झड़प देश को कई साल पीछे ले जाती है, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है।

इसलिए हम सबको एक साथ आगे बढ़ना है, एक बार फिर उन्हीं लक्ष्यों को याद करते हुए, इन बलिदानों को याद करते हुए, उन्हीं लक्ष्यों को लेकर आगे बढ़ना है, प्यार, मुहब्बत, भाईचारा, साथ रहना और मरना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। विविधता में एकता होनी चाहिए और एक ऐसा समाज होना चाहिए जिसे मिसाली समाज कहा जाता है।

भाई राफ़े इस्लाम ने इस मौके पर सभी देशवासियों और देश के नेताओं से दर्दभरी अपील की और कहा कि यह समय एक साथ बैठकर सोचने का है कि आने वाले समय में हमें देश को कहां ले जाना है. हमें उम्मीद है कि आजादी की 77वीं वर्षगांठ हमारे देश में समृद्धि का एक नया संदेश लाएगी, प्रेम की एक नई गाथा शुरू करेगी।

  ~ काशिफ खान

( मीडिया इंचार्ज ) एस.आई.ओ यूपी सेंट्रल

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